How was Hyundai founded

How was Hyundai founded – दोस्तों, ये है चुंग जु एक गरीब किसान के बेटे, जो अमीर बनने के लिए बचपन में चार बार घर से भागे और तीन बार उनके पिता पकड़कर वापस खेती के काम में लगाए हैं, सपना तो था एक टीचर बनने का, लेकिन सात भाई बहनों का पेट भरना ही जब मुश्किल हो तो सपने देखना एक गुनाह से कम नहीं है। लेकिन रुकिए ज़रा। इनके बारे में थोड़ा और जान लेते हैं। फिर फ्लैशबैक में चले जाऊंगा।

साउथ कोरिया के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक और हुंडइ ग्रुप के फाउंडर थे। जी हाँ, वहीं हुंडई ग्रुप जिसकी एक सब्सिडरी हुंडई मोटर्स, टाटा और महेंद्र जैसे ऑटोमोटिव कंपनी की नाक में दम कर रखा है और वास्तव में अगर देखा जाए तो हुंडई शायद इंडियन कस्टमर्स टाटा और महिन्द्रा से भी बेहतर समझते हैं। तभी तो सालों से मारुति सुजुकी के बाद हुंडई नहीं इंडियन मार्केट में दूसरे पोजिशन पर कब्जा जमा रखा।

हुंडई की शुरुआत

तो चलिए जानते है हुंडई की शुरुआत से लेकर आज तक की इन्ट्रेस्ट दोस्तों चांग का जन्म साल 1915 में नॉर्थ कोरिया के एक छोटे से गांव में हुआ था। उस समय कोरिया जापान के कंट्रोल में था और खराब इकॉनमी और प्रतिबंधों की वजह से। लोगों का जीना मुश्किल हो गया। उनके पिता एक गरीब किसान थे और घंटों खेतों में काम किया करते थे। ना चाहते हुए भी चांग को अपने पिता की मदद करनी पड़ती हुआ कभी जानवरों को चराने जाते थे तो कभी जलाने की लकड़ियां बेचकर कुछ पैसे इकट्ठा करने की कोशिश करते थे। लेकिन फिर भी दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से नसीब हो पाती थी।

अपनी गरीबी से तंग आकर चांग अक्सर ये सोचा करते थे कि क्या उन्हें भी अपने पिता की तरह जिंदगी भर स्ट्रगल करना पड़ेगा? सपना तो पढ़ लिखकर टीचर बनने का था लेकिन पैसों की कमी थी । अब उनके पास रास्ते दो ही थे। या तो वे खेती कर रहे हैं या फिर घर से भाग जाए। चांग ने दूसरा रास्ता चुना और 16 साल की उम्र में ही घर से भाग गए। वो भी एक बार नहीं बल्कि चार बार। तीन बार तो पिता ने उन्हें ढूंढ निकाला और डांट फटकार कर घर वापस लिया।

16 साल की उम्र में ही घर से भाग गए

लेकिन चौथी बार वे वापस आने के लिए नहीं निकले थे क्योंकि उन्हें बाहर जिंदगी का वो मज़ा मिल चुका था जिसे वह छोड़ना नहीं चाहते थे। वह सीधे सीओल जो आज साउथ कोरिया का कैपिटल है, वहाँ जाकर कुछ दिन वहाँ एक लेबर और फिर एक स्टाफ बनके फैक्टरी में हैंडीमैन का काम किया है और फिर उन्हें राइस स्टोर में डिलिवरी बॉय की एक बेहतर नौकरी मिल गई, जिससे उनकी लाइफ पहले से कुछ बेहतर। कम से कम समय से उन्हें दो टाइम का खाना नसीब होने लगा।

कंपनी का मालिक उनकी मेहनत देखकर काफी इंप्रेस और छे महीने के भीतर ही उन्हें स्टोर अकाउंटेंट बना दिया और कुछ दिन बाद खराब हेल्थ की वजह से उस राइस स्टोर को चांग के हाथों ही बेच दिया। दोस्तों अभी चांग की उम्र सिर्फ 22 साल की थी। उन्होंने राइस स्टोर का नाम बदलकर क्योंकि राइस स्टोर कर दिया और लो प्राइस के दम पर अपना एक नया कस्टमर बेस तैयार किया है।

टाउन के बेस्ट राइस मिलर बन गए

अगले कुछ सालों तक चांग ने अच्छा प्रॉफिट भी कमाया और टाउन के बेस्ट राइस मिलर बन गए। लेकिन किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया और जैपनीज़ कोलोनिअल गवर्नमेंट ने उनकी राइस शॉप को बंद करा दिया। दरअसल चाइना से चल रहा है वॉर की वजह से कोरिया में राइस रेसिंग सिस्टम लागू कर दिया गया था, जिससे कि जापान और उनकी आर्मी को राइस अप्लाई किया जा सके। अब चांग के पास तो फ़िलहाल घर वापसी के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था लेकिन उनके विज़न में कोई बदलाव नहीं आया।

1 साल वो गांव में ही रुके और फिर साल 1940 में वापस में कुछ ऐसा बिज़नेस स्टार्ट करने का फैसला किया है जिसमें गवर्नमेंट का कोई हस्तक्षेप न हो और काफी सोच विचार के बाद एक कार रिपेरिंग का बिज़नेस शुरू किया। यह काम भी अच्छा चला और 3 साल में ही के पास 70 लोग काम करने लगे, लेकिन किस्मत ने एक बार फिर धोखा दिया। जैपनीज़ गवर्नमेंट ने वोर में इस्तेमाल करने के लिए उनके इस गैरेज को एक स्टील प्लांट के साथ मर्ज कर दिया और सियोल में बढ़ते तनाव को देखते हुए चौक को एक बार फिर अपने गांव वापस लौटना पड़ा।

सिविल ऐंड कंस्ट्रक्शन के फील्ड में उतरते

हालांकि चांग के पास लगभग 50,000 की सेविंगस थी, जिसे उन्होंने अपने अगले बिज़नेस के लिए बचाकर रखा। धीरे धीरे समय बीता और जब साल 1946 में सेकंड वर्ल्ड वॉर का अंत तो कोरिया जापान के चंगुल से आजादी और बिना किसी गवर्नमेंट रिस्ट्रिक्शन के चांग ने अपने सर्विस गैरेज को के हुंडई ऑटो सर्विस सेंटर के नाम से फिर शुरू किया और यूएस आर्मी के ट्रक रिपेरिंग का काम करने लगे। इसके अलावा सिविल ऐंड कंस्ट्रक्शन के फील्ड में उतरते जर्मनी हुंडई सिविल इंडस्ट्रीज़। शुरुआत की है

दोस्तों, आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि हुंडई का मतलब होता है मॉडर्न गवर्नमेंट वॉर में डैमेज हुए इन्फ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्रीज़ के रीकॉन्सट्रक्शन के लिए जंग। जैसे डू आर ढ़ाई स्पीड वाले इंसान की जरूरत है जिसकी वजह से उन डाइ सिविल इंडस्ट्रीज़। एक्सप्रेस वे कुल शान में दुनिया का सबसे बड़ा शिपयार्ड और न्यूक्लियर प्लांट जैसे बड़े बड़े प्रोजेक्ट्स को ने सक्सेस्स्फुल्ली कंप्लीट किया।

हुंडई साउथ कोरिया की फास्टेस्ट ग्रोइंग कंपनी

हालांकि गवर्नमेंट के बेतहाशा मदद के बिना यह काम इतना आसान नहीं था। हुंडई साउथ कोरिया की फास्टेस्ट ग्रोइंग कंपनी बन गई है और अब समय आ गया था बिज़नेस को इंटरनेशनल लेवल पर ले जाने का। सऊदी अरब का जुबैल इंडस्ट्रियल हार्बर प्रोजेक्ट और बहरीन का शिपबिल्डिंग और रिपेर यार्ड। हुंडई के कुछ इंटरनेशनल प्रोजेक्ट्स के एग्जाम्पल है, लेकिन इतने डाइवर्सिफिकेशन के बाद ऑटो सेक्टर में ग्रोथ की पॉसिबिलिटीज़ को हमेशा तलाशते रहे हैं और साल 1960 में कोरियन गवर्नमेंट की एक पॉलिसी है। हुंडई के ऑटोमोटिव डिविजन में एक नई जान डाल दी। दरअसल गवर्नमेंट ने यह रूल बना दिया की कोई भी विदेशी ऑटोमोटिव कंपनी है।

साउथ कोरिया में केवल लोकल पार्टनर के साथ मिलकर ही बिज़नेस कर सकती है। लेकिन अब हुंडई के पास कार बनाने की तकनीक तो थी नहीं इसलिए चांग ने साल 1967 में हुंडई मोटर कंपनी की शुरुआत करके फोर्ड मोटर की साझेदारी में काम करना शुरू कर दिया और उलसान में सिर्फ छह महीने में ही एक लार्ज असेंबली लाइन को खड़ा कर दिया। फोर्ट को टीना की तर्ज पर हुंडई को टीना कार को लॉन्च किया गया लेकिन एक गलती यह हो गयी की फॉर कोटी ना? ब्रिटेन की सड़कों के लिए डिजाइन की गई है एक आर्थिक जो ओर से उबरे साउथ कोरिया की खराब हो को झेल नहीं पाई या मॉडल फेल होने लगी और यहाँ तक कि लोग रिफंड की डिमांड करने लगे।

चांग ने तो हारना सीखा ही नहीं था

बाकी रही सही कसर 1969 में आई एक फ्लड जब आई एक जब पूरी असेंबली लाइन और तैयार पड़े कार्स चार पांच फिट बाढ़ के पानी में डूब गए। नौबत यहाँ तक आ गई कि लोग चांग को कार प्रोडक्शन बंद करने की सलाह देने लगे। लेकिन चांग ने तो हारना सीखा ही नहीं था। असेंबली लाइन को फिर से ठीक किया गया और कार का प्रोडक्शन शुरू हुआ और कुछ सालों में जब साउथ कोरिया की सड़कें अच्छी होने लगे तो? सेल्स में तेजी से इजाफा होने लगा, लेकिन साल 1974 में फोर्ड मोटर्स से कुछ मतभेद की वजह से चांग ने उनके साथ कॉन्ट्रैक्ट कैंसिल कर दिया और फिर दुनिया में का एक नया दौर शुरू हुआ।

मोटर से कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के बाद हुंडई ने अमेरिका की मित्सुबिशी के साथ इंजिन और एक्सेल के लिए एक कॉन्ट्रैक्ट साइन किया और अपने अगले कार की डिजाइन के लिए। यूरोपियन इंजीनियर्स की पूरी टीम को हायर कर लिया और जब कोरिया की जरूरतों के हिसाब से बनी नई कार हुंडई पोनी को सिर्फ 5900 डॉलर्स के प्राइस पर लॉन्च किया गया तो लोगों ने इसे खूब पसंद किया। यहाँ तक की कोरिया के बाहर कनाडा में भईया बेस्ट सेलिंग कार बन गई, लेकिन यूनाइटेड स्टेट जैसे जरूरी बाजार में इस कार को एमिशन नॉर्म्स की वजह से लॉन्च नहीं किया जा सका।

2004 में हुंडई ने टोयोटा के बाद दूसरी बेस्ट इनिशियल ब्रैंड क्वालिटी

इसके लिए हुंडई ने साल 1985 में अपनी दूसरी कार हुंडई एक सेल को बनाया जिसे यूएस मार्केट में सेल करने का परमिशन मिल गया। अब दिक्कत ये थी कि हुंडई कार सको एक चिप कोरियन बैंड की तरह देखा जाने लगा क्योंकि इन कार्स में फीचर्स की कमी थी और इनकी रिलायबिलिटी भी मार्केट में मौजूद है और ब्रैन्डस के कार्स की तुलना में काफी कम है। और उनकी टीम ने बिना थके दिन रात मेहनत किया। ऐडवांस इंजिन और कार के पार्ट्स डेवलप किए गए और साल 1990 में अपने फीचर लोडेड कार्ड जो नडाइ, ऐसेंट, सोनाटा और इलैन्ट्रा को मार्केट में उतार दिया। इन कार्स ने हुंडई के रेपुटेशन और सेल्स फीगर को पलटकर रख दिया और 1998 में जुदाई ने किया मोटर्स पर भी अपना कब्जा कर लिया और इन दोनों ने मिलकर क्वालिटी मैन्युफैक्चरिंग और डिजाइन प्रोसैस पर इतना हेवी इन्वेस्टमेंट किया कि साल 2004 में हुंडई ने टोयोटा के बाद दूसरी बेस्ट इनिशियल ब्रैंड क्वालिटी का खिताब भी अपने नाम कर लिया।

दोस्तों अगर इंडियन मार्केट की बात की जाए तो हुंडई ने यहाँ साल 1996 में अपनी एक स्मॉल फैमिली कार सैंट्रो के साथ इंटर किया था, जिसे खूब पसंद किया गया और शायद आपको याद होगा कि उस दौर में कुल पांच कार ब्रैन्डस इंडिया में इस्टैब्लिश दे। पैसेंजर कार सेगमेंट में मारुति सुजुकी का ही बोलबाला तब भी था क्योंकि टाटा मोटर्स और महिन्द्रा ज्यादातर यूटिलिटी और कमर्शल वीइकल्स ही बनाते थे। जबकि हिंदुस्तान और प्रीमियर की कार्स आउटडेटेड और कॉम्पिटिशन से बाहर हो गईं थी। वैसे आज भी हुंडई मोटर्स मारुति सुजुकी को तो पीछे नहीं छोड़ पाई, लेकिन सीधी टक्कर देना शुरू कर दिया है। आज जहाँ अपने देश में कुल पैसेंजर कार सेल्स में 40% से ज्यादा है, मारुति की गाड़ियां होती है तो वहीं हुंडई और किया का कंबाइंड सेल्स 20% के आसपास होता है और आज हुंडई की कार जीप। ब्रैंड नहीं बल्कि अपनी टेक्नोलॉजी और कम्फर्ट के लिए जानी जाती है

दोस्तों चांग कुछ बड़ा करने का सपना पूरा होने में थोड़ा समय तो जरूर लगा लेकिन जब साकार हुआ तो इतना बड़ा बनकर सामने आया कि दुनिया के ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी बेताज बादशाह

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