Mahindra and Mahindra Success story

Mahindra and Mahindra Success story – दोस्तों महिन्द्रा कंपनी के इस सफर की शुरुआत होती है। 1892 में जब पंजाब के लुधियाना शहर में इस कंपनी के फाउंडर जगदीश चंद्र महेंद्र का जन्म हुआ, वो अपने नौ भाई बहनों में सबसे बड़े थे और बचपन में ही अपने पिता को खो देने की वजह से परिवार की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर आ गई। अब उस समय जैसी महिन्द्रा की उम्र भले ही कम थी। लेकिन उन्होंने अपने भाई बहनों को पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। अंग्रेजों का रास्ता और एक आम इंडियन के लिए अच्छी शिक्षा पाना बहुत ही ज्यादा मुश्किल है, लेकिन उस दौर में भी जैसी महिन्द्रा ने पढ़ाई लिखाई के महत्त्व को अच्छी तरह समझ लिया था।

इसलिए उन्होंने वीजेटीआई से अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कंप्लीट की और अपने छोटे भाई कैलाशचन्द्र महिन्द्रा को हायर एजुकेशन के लिए अमेरिका भेजे । फिर पढ़ाई पूरी होने के बाद जेसी महिन्द्रा को टाटा स्टील सीनियर सेल्स मैनेजर के पद पर एक अच्छी जॉब मिल गई और वहाँ साल 1929 से 1940 तक उन्होंने काफी चिंतन से काम किया, जिसका नतीजा ये हुआ कि सेकंड वर्ल्ड वॉर के दौरान सरकार ने उन्हें भारत का पहला स्टील कंट्रोलर नियुक्त कर दिया। और बात अगर उनके छोटे भाई कैलाश चंद महेंद्र यानिके सी महिन्द्रा की करें तो केम्ब्रिज ने पढ़ाई पूरी होने के बाद वह कुछ सालों तक अमेरिका में ही गए और 1942 में उन्हें अमेरिका के अंदर इंडिया के परचेजिंग मिशन का हेड बना दिया गया और फिर 1945 जब वो वापस लौटकर इंडिया आए तो सरकार ने उन्हें इंडियन कोल फील्डस कमेटी और ऑटोमोबाइल ट्रैक्टर पैनल का चेयरमैन बना दिया।

देश के अंदर स्टील इंडस्ट्री

हालांकि उसके बाद भी महिन्द्रा ब्रदर्स को भाई, सरकारी और निजी संस्थाओं का भी बड़े बड़े पदों पर हुए, लेकिन अब उनकी सोच बदलने लगी थी। देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था और उन्हें यकीन था कि हम जल्दी ही अपनी आजादी हासिल कर लेंगे। साथ ही वो इस बात को भी अच्छी तरह समझते थे कि भारत की आज़ाद हो जाने के बाद देश के अंदर स्टील इंडस्ट्री काफी तेजी से ग्रो करने वाली है, लेकिन इस बिज़नेस को शुरू करना। इतना आसान नहीं था।

एक बड़ी रकम थी,जिसे इकट्ठा करने के लिए दोनों भाइयों ने अपना घर भेज दिया और अपने एक दोस्त मलिक गुलाम मोहम्मद के साथ मिलकर एक स्टील कंपनी की शुरुआत की, जिसका नाम महिन्द्रा ऐंड मोहम्मद रखा गया और यहीं से शुरुआत हुई महिन्द्रा ग्रुप के विशाल साम्राज्य की। आज भले ही महिन्द्रा अपने पावरफुल व्हीकल्स के लिए जाने जाती है। लेकिन सच यही है की इसकी शुरुआत एक स्टील ट्रेडिंग कंपनी के रूप में हुई थी।

सबसे कामयाब स्टील कंपनी बनाने का सपना देखा था

उस समय दोनों महिन्द्रा भाइयों ने मलिक गुलाम मोहम्मद के साथ मिलकर अपनी इस कंपनी को देश की सबसे बड़ी और सबसे कामयाब स्टील कंपनी बनाने का सपना देखा था। लेकिन 1947 में कुछ ऐसा हुआ जिसने सबकुछ बदलकर रख दिया। क्योंकि जब देश का पार्टीशन हो तो मालिक गुलाम मुहम्मद छोड़ कर हमेशा के लिए पाकिस्तान चले गए और उनके इस फैसले ने महिन्द्रा ब्रदर्स को हिलाकर रख दिया क्योंकि सब कुछ दांव पर लगा हुआ था।

लेकिन शायद गुलाम मोहम्मद जी को पाकिस्तान में ही अपना फ्यूचर देखा और उनका यह फैसला शायद सही भी साबित हुआ क्योंकि वो पाकिस्तान के पहले फाइनैंस मिनिस्टर बनाए गए। अब गुलाम मोहम्मद की पूरी हिस्सेदारी खत्म होने के बाद एक तरफ जहाँ फंड की दिक्कत हो रही है। इससे दिक्कत ये थी कि महिन्द्रा एंड मोहम्मद नाम के चलते कंपनी की सारी स्टेशनरी एम एंड एम नाम से छप चुकी थी और इसके रिपोर्ट पर फालतू खर्च करने की बजाय कंपनी का नाम महिन्द्रा एंड महिन्द्रा रख दिया गया ताकि इसका शोर्ट नेम एम एंड एम ही रहे और पुराने स्टेशनरी वेस्ट ना जाए। लेकिन महिन्द्रा और महिन्द्रा कंपनी के लिए काफी मुश्किल हो रहा था और ज्यादातर लोग तो यही सोच रहे थे की अब कंपनी सर्वाइव नहीं करेगी लेकिन महेंद्र ब्रदर्स लगातार कंपनी को चलाने का प्रयास करते रहे और आखिरकार दोनों भाइयों की वो मेहनत रंग लाई जिसके चलते महिन्द्रा एंड महिन्द्रा डूबने से बच गई।

इंडिया में ही असेंबल करके बेचने लगी

अब यूं तो महिन्द्रा कंपनी स्टील इंडस्ट्री के अंदर ठीक ठाक बिज़नेस कर रही थी लेकिन अब कुछ ऐसा करने का इरादा था जो उनसे पहले भारत में किसी और कंपनी ने ना किया हो महिन्द्रा के विदेश में रहने का एक्सपिरियंस काम आया। दरअसल कै सी महिन्द्रा अमेरिका की सड़कों पर जीप को देखकर काफी इम्प्रेस हुए थे और वे इंडिया में भी इसको लाना चाहते थे। बस फिर क्या था महिन्द्रा ने इस साल 1947 में कंपनी से बात की और एक कॉन्ट्रैक्ट के तहत वो इंडिया में ही असेंबल करके बेचने लगी है।

क्यों की ये जीप सेकंड वर्ल्ड वॉर के दौरान मिलिट्री के लिए डिजाइन की गई थी। इसलिए इसकी मजबूत बनावट और हाई ग्राउंड क्लियरेंस उस समय भारत की खराब सड़कों के लिए बिल्कुल परफेक्ट। इसलिए लोगों के बीच यह जीत काफी पॉपुलर हो गई और धीरे धीरे महिन्द्रा की इमेज एक ऑटोमोटिव कंपनी के रूप में बनने लगी। फिर साल 1951 में जे सी महिन्द्रा और 1963 में कै सी महिन्द्रा की जब डेथ हुई तब महिन्द्रा ऐंड महिन्द्रा अपने देश की एक सक्सेसफुल कंपनी बन चुकी थी।

अपने पिता की हेल्प करने लगे थे

जिसके बाद इस कंपनी की बात कै सी महिन्द्रा के बेटे की हाथ सौंपी गई। हालांकि अमेरिका की पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की बात साल 1947 से ही वो अपने पिता की हेल्प करने लगे थे। लेकिन जब कंपनी की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आई तब वो बिज़नेस को अपने हिसाब से डाइवर्सिफाई करने लगे, जिसकी शुरुआत की उन्होंने ट्रैक्टर बिज़नेस से की। दरअसल, चीफ मैनयुफैक्चरिंग की सक्सेस से महिन्द्रा ग्रुप का झुकाव ऑटोमोटिव सेक्टर की तरफ कुछ ज्यादा ही होने लगा।

हर साल 1963 में अमेरिका की इंटरनेशनल हार्वेस्टर कंपनी के साथ एक ज्वाइंट वेंचर में महिन्द्रा ने भी 75 ट्रैक्टर को लॉन्च किया और इसके अलावा तमाम तरह के फार्मिंग इक्विपमेंट सभी बनाने लगे। लेकिन गौर करने वाली एक बात और भी है कि उसी दौरान महिन्द्रा परिवार में वो चिराग भी जल चुका था जिसकी रौशनी में महिन्द्रा डूब कर रहे हैं। 80 गुना से भी ज्यादा पढ़ने वाला था। जी हाँ। दोस्तों जैसी महिन्द्रा के बेटे हरीश महिन्द्रा के घर आनंद महिन्द्रा का जन्म हो चुका था और वो अपनी शुरुआती पढ़ाई के लिए फुंटी के फेमस लॉरेंस स्कूल जा चुकी है।

बिज़नेस को डायवर्सिफाई करना एक बड़ा चैलेंज होगा

केशव महिन्द्रा के लिए बिज़नेस को डायवर्सिफाई करना एक बड़ा चैलेंज होगा, क्योंकि सिक्सटीज में गवर्नमेंट के रेगुलेशंस और लाइसेंस राज़ की वजह से अपने मुताबिक काम करना पॉसिबल ही नहीं था। यहाँ तक कि कितने चीप और ट्रैक्टर्स का प्रोडक्शन करना है, ये भी गवर्नमेंट ही डिसाइड करती थी, लेकिन ऐसे चैलेंजिंग माहौल में भी उन्होंने कंपनी की ग्रोथ को बरकरार रखा और एटीएस के दशक में महिन्द्रा ने अपने बिज़नेस को भारत के बाहर भी एक्सपैंड करना शुरू कर दिया।

साल 1986 में टेक महिन्द्रा की शुरुआत हुई जो आज महिन्द्रा की दूसरी सबसे बड़ी फ्लैगशिप कंपनी होने के साथ ही। इसके के साथ इंडिया के एक टॉप फाइव आईटी कंपनीज में अपनी जगह रखती है। और फिर आया नाइंटीज का वो दशक जब महिन्द्रा ने हॉस्पिटैलिटी और टूरिज्म जैसे बिल्कुल नए स्पेस में इंटर किया और 96 में क्लब महेंद्र हॉलिडेज की शुरुआत की गई।

40 इयर्स की एज में कंपनी के चेयरपर्सन

दरअसल, केशव महिन्द्रा जी 40 इयर्स की एज में कंपनी के चेयरपर्सन बनाए गए। हर साल 2012 तक यानी कि अगले 40, 80 इयर्स तक इस पद पर बने रहें। दोस्तों और शायद आपको ऐसा लग रहा होगा कि महिन्द्रा कंपनी में जो कुछ भी अच्छा होगा उस सब कुछ तो केशव महिन्द्रा जी के समय में ही हो गया था तो फिर आनंद महिन्द्रा ने किया ही क्या? बहुत कुछ किया दोस्त वरना महिन्द्रा ग्रुप आज जैसी है वैसी नहीं रहते।

हालांकि यंग एज में उन्हें बिज़नेस में कोई इंटरेस्ट नहीं था। वो फ़िल्म मेकिंग और फोटोग्राफी को अपना करियर बनाना चाहते थे, लेकिन हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए कंप्लीट कर के वापस आने की बात 81 में आनंद महिन्द्रा को अपने स्टील डिविजन महिन्द्रा यूजीन स्टील को एक आम एम्प्लाई की तरह ज्वॉइन करना पड़ा। इस काम में मज़ा आने लगा और वो धीरे धीरे एक एक पायदान ऊपर की तरफ बढ़ने लगे।

91 में उन्हें महिन्द्रा एंड महिन्द्रा का डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर

91 में उन्हें महिन्द्रा एंड महिन्द्रा का डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर, 97 में मैनेजिंग डाइरेक्टर और फिर साल 2001 कंपनी का वाइस चेयरमैन बना दिया गया। फिर अगस्त 2012 वो समय आया जब उनके अंकल के शुभ महिन्द्रा ने चेयरमैन पद की जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी। असल में लिबरलाइजेशन से पहले या यूं कहें कि आनंद महिन्द्रा की एक होल्डिंग पोजिशन पर पहुंचने से फायदे। महिन्द्रा कंपनी ने अपने बिज़नेस को अलग अलग सेक्टर्स में डाइवर्सिफाई तो कर लिया था, लेकिन उनके ज्यादातर बिज़नेस इस किसी विदेशी कंपनी के काम पर चल रही थी, रिलीज के लाइसेंस पर बेच रहे थे, इंटरनेशनल हार्विस्टर के साथ जेवी में ट्रैक्टर बना रहे थे।

यहाँ तक कि उनकी आईटी फर्म टेक महिन्द्रा भी ब्रिटिश टेलीकॉम के साथ कोलैबोरेशन में काम कर रही थी। अपना कुछ भी नहीं था। जिसे कंपनी का रेवेन्यू और प्रॉफिटेबिलिटी बहुत ही ज्यादा कंपनी। लेकिन आनंद महिन्द्रा का अंदाज ही अलग है। उनके अंदर गजब का कॉन्फिडेंस हैं। उन्हें किसी के सहारे पर कंपनी को आगे नहीं ले जाना था। उनके अग्रेसिव डिसिशन्स और फ्यूचर हो ऑरिएंटेड अप्रोच की वजह से ही 91 में जी सी महिन्द्रा ग्रुप का कुल रेवन्यू जहाँ 1500 ₹20,00,00,000 था वो आज बढ़कर 1.2,00,000 करोड़।

लेकिन ये चमत्कार हुआ कैसे? आइए इसके पीछे की कहानी को भी जानते हैं। दरअसल नाइंटीज में सुजुकी, हुंडई, जनरल मोटर्स जैसे ब्रैंड्स के इंडिया में आने से मार्केट में लोगों के पास टाटा और महिन्द्रा के अलावा कई और भी बेहतर अफसोस आ गए जो गुड लुकिंग होने के साथ ही फ्यूल एफिशिएंट भी थे। लेकिन महिन्द्रा अपनी वही पुरानी जीत में कुछ चेंजस करके। ग्रैंड जैसी गाड़ियां लॉन्च करती रही, जिसमें लोगों की दिलचस्पी कम होती है।

हिन्द्रा ने जिंदगी का सबसे बड़ा रिस्क लेने का फैसला किया

हालांकि कुछ नए प्रोडक्ट्स भी लाने की कोशिश की गई। जैसे फोर्ड के साथ मिलकर फूड्स कोर्ट से डॉन को लॉन्च किया गया, जो पूरी तरह से फ्लॉप हो गई। तब आनंद महिन्द्रा ने जिंदगी का सबसे बड़ा रिस्क लेने का फैसला किया। साल 1993 उन्होंने अपनी आंधी टीम को लिस्ट चल कर के। पवन गोयनका जी को अपनी टीम में शामिल किया, जो उस समय जनरल मोटर्स इन टेक्नोलॉजी के इस स्पेशलिस्ट माने जाते थे।

आनंद महिन्द्रा के दिमाग में क्या चल रहा है, आज ये अंदाजा किसी को भी नहीं। उन्होंने एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई और जब पवन गोयनका सेफ बिलकुल नए प्लैटफॉर्म पर एक इंडियन कॉम्पैक्ट एसयूवी डिजाइन करने का खर्च पूछा तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई है। की जरूरत है जो महिन्द्रा ग्रुप की 4 साल की प्रॉफिट से भी ज्यादा थी, लेकिन पीछे हटना आनंद जी ने सिखाया नहीं। उन्होंने कुछ खर्चों में कटौती करके इस प्रोजेक्ट को 550,00,00,000 के बजट में आगे बढ़ाने का ऑर्डर दे दिया और इस तरह 2002 महिन्द्रा की किस्मत बदलने वाला कॉम्पैक्ट एसयूवी स्कॉर्पियो को लॉन्च किया गया जबकि इसके 2 साल पहले। इन हाउस इन जिनके साथ बोलेरो और स्कॉर्पियो की इस जोड़ी ने इंडियन मार्केट में धूम मचा दिया।

एक्सयूवी जैसी दमदार गाड़ियां

एक्सयूवी जैसी दमदार गाड़ियां महिन्द्रा को मानो पंख भी लगा दिया और दोस्तों आपको पता ही है आज भी ये सारी गाड़ियां टॉप सेलिंग कास्ट में सुधार है। इसके अलावा महिन्द्रा की डिफेंस आज इंडिया ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम देश भरोसा करते हैं। स्कॉर्पियो की सफलता के बाद आनंद महिन्द्रा ने तेजी से विदेशी कंपनीस को एक्वायर करना शुरू किया। गुजरात ट्रैक्टर्स और पंजाब ट्रैक्टर्स को अपने मर्ज करके साल 2010 में महिन्द्रा दुनिया की नंबर वन ट्रैक्टर निर्माता कंपनी बन गई।

काइनेटिक मोटर्स रेवा इलेक्ट्रिक और यूके की लीजेंडरी बाइक कंपनी एस डी और बीएससी मोटरसाइकिल इन सब पर आज महिन्द्रा का ही कब्जा है। ये लिस्ट काफी लंबी है। साउथ कोरिया की सैन्य और इटली की फेमस का डिजाइन कंपनी पिनिनफरिना में कंट्रोलिंग स्टेक लेकर महिन्द्रा ने दुनिया को हैरान कर दिया था। ये वही पिनिनफरीना है जिसने ₹20,00,00,000 की कीमत वाली इलेक्ट्रिक, हाईपर कारपिन, फरीदाबाद, तीस्ता को बनाया है। इसके अलावा आज महिन्द्रा के पास वर्ल्ड क्लास रेसिंग टीम भी मौजूद है। आज महिन्द्रा के टोटल रेवेन्यू का 50% हिस्सा अकेले उसके ऑटोमोटिव डिवीज़न से ही आता है, बाकी 31% टेक महिन्द्रा और लगभग 9% रेवेन्यू फाइनेंशियल सर्विसेज जेनरेट करता है।

इतिहास और बिज़नेस एंपायर

तो दोस्तों, अब तक आप महिन्द्रा कंपनी के इतिहास और बिज़नेस एंपायर के बारे में काफी कुछ जानते होंगे। लेकिन अगर पर्सनली आनंद महिन्द्रा की बात करें। तो उस समय के साथ चलने वाले एक ऐसे कॉर्पोरेट लीडर हैं जिन्होंने लोगों की जरूरतों के हिसाब से अपने प्रॉडक्ट को अपडेट किया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टैक्स पर काफी एक्टिव रहने से वो हमेशा सुर्खियों में बने रहते हैं और अपने बीजी शेड्यूल से कुछ समय निकालकर मुंबई में हर साल महिन्द्रा पुलिस फेस्टिवल का आयोजन करते हैं।

शायद फ़िल्म मेकिंग और फोटोग्राफी के लिए उनका प्यार अभी भी बरकरार है। उनकी वाइफ अनुराधा एक जर्नलिस्ट जो अब एक फेमस लग्जरी एंड लाइफ स्टाइल मैगजीन की एडिटर है। आनंद महिन्द्रा ने 1996 डिजिट की शुरुआत की थी, जिसके जरिए वो 5,00,000 से भी ज्यादा गरीब लड़कियों की पढ़ाई में मदद कर चूके हैं। इंडियन बिज़नेस इंडस्ट्री में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने साल 2000 उन्हें पद्मभूषण से भी सम्मानित किया था।

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